13 अप्रैल २०२१ को शुरू हो रही हैं चैत्र नव रात्रि : कलश स्थापना मुहूर्त एवं पूजन विधि

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१३ अप्रैल को चैत्र प्रतिपदा के साथ ही  नव संवत्सर २०७८ की शुरुआत भी होगी जो हिंदू धर्म में नए वर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। १३ अप्रैल से शुरू होने वाला संवत्सर,  ‘राक्षस’ नामक संवत्सर माना जाएगा। चैत्र प्रतिपदा से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी जिसका समापन २२ अप्रैल रामनवमी को होगा।

इस नव वर्ष का क्या रहेगा आने वाले वर्ष में असर इसे में दूसरे ब्लॉग में वर्णित करूँगी, हालाँकि यह भी सत्य है की पिछले  नव संवत्सर के ब्लॉग में जो भी लिखा वह सत्य साबित हुआ चाहे फिर कोरोना जैसी महामारी हो या फिर जनमानस का गवर्न्मेंट/ सरकार के साथ विरोध ( किसान आंदोलन)।

अपने मार्च २०२० के YOUTUBE विडीओ में  कहा था कि कोरोना सितंबर २०२० से कम होगा लेकिन फिर २० नवम्बर २०२० से किसी दूसरे म्यूटंट फ़ॉर्म में शुरू हो जाएगा जो २०२१ एवं अप्रैल २०२२ तक वैश्विक महामारी को फैलाएगा। कोरोना का कुछ ऐसा ही पैटर्न  हमने पिछले वर्ष देखा।

13 अप्रैल २०२१ को शुरू हो रही हैं चैत्र नव रात्रि :

चैत्र नवरात्रि महत्व एवं विधान : 

चैत्र प्रतिपदा का महत्व पूरे जंबूद्वीप यानी की भारतवर्ष में धूम धाम से मनाया जाता है। विभिन्न प्रदेशों में इसे विभिन्न रूपों में मनाया जाता है एवं हर सामाजिक तबके में इसका एक विशेष महत्व है।

इसी दिन को महाराष्ट्र में गुडी पड़वा के रूप में मनाया जाता है एवं इसी दिन दक्षिण में इसे उगादि (ugadi) के रूप में मनाया जाता है। हिन्‍दू विक्रम संवत्सर के अनुसार हर वर्ष चैत्र (Chaitra) महीने के पहले दिन से ही नव वर्ष की शुरुआत हो जाती है. साथ ही इसी दिन से चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navaratri 2019) भी शुरू हो जाते हैं. ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण भी इसी दिन किया था। प्रभु राम एवं युधिष्ठर  का राज्यभिषेख भी इसी दिन किया गया था। भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार भी इसी दिन माना जाता है। महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन की थी, संत झूलेलाल की जयंती भी इसी दिन मनायी जाती है।

नवरात्रि का महत्व:

नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा (Durga) के सभी नौ रूपों की पूजा की जाती है. पूरे वर्ष में चार नवरात्रि होती हैं, जिनमे दो गुप्त नवरात्रि होती हैं जो तांत्रिक सिद्धि के लिए मुख्यतः मानी जाती हैं एवं दो सामाजिक रूप से मनायी जाने वाली नवरात्रि होती हैं जिन्हें चैत्र के महीने में एवं शरद नवरात्रि के रूप में धूम धाम से मनाया जाता है।

इन पूरे नौ दिन, संसार में देवी शक्ति का संचार अत्यधिक रूप में रहता है एवं उनकी उपासना से साधक के जीवन में धन धान्य, सुख समृद्धि एवं परिवार में ख़ुशहाली सभी बड़ती है। शत्रुओं का हनन होता है एवं किसी भी प्रकार के नज़र दोष,भूत-प्रेत, तंत्र मंत्र का असर आदि से भी मुक्ति प्राप्त होती है।  इन पूरे नौ दिनो में माँ  के नौ स्वरूपों के पूजन का विधान है।

इस बार चैत्र नवरात्रि की शुरुआत १३ अप्रैल २०२१, अश्विनी नक्षत्र से हो रही है, एवं इसका समापन २२ अप्रैल को राम नवमी के साथ होगा।  इस वर्ष माँ घोड़े पर सवार होकर आएँगी।

नवरात्रि की पूजा-विधि:

नवरात्रि में प्रथम दिन, शुभ  मुहूर्त में कलश स्थापना की जाती है, किसी मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं। नवग्रहों के साथ षोडश मात्रिकाओं एवं समस्त देवी देवताओं का आवहन कर पूजन किया जाता है। अखंड ज्योति जलायी जाती है एवं माँ  के नौ रूपों का विधिवत पूजन किया जाता है। यह समय साधना के लिए सर्वोत्तम रहता है। माँ के नवार्ण  मंत्र का पूजन विशेषकर किया जाता है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना से पूर्व निम्न मंत्र का उच्चारण कर माँ  का आशीर्वाद लेकर नवरात्रि पूजन की शुरुआत करें :

 “ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।” 

माँ  के नवार्ण मंत्र का जप, माँ के भक्तों को समस्त समस्याओं से मुक्त कराता है। दुर्गा सप्तशती में वर्णन है की माँ ही महामारी का रूप हैं एवं माँ ही उसका निवारण भी हैं। उनकी उपासना से व्यक्ति किसी भी प्रकार की महामारी के संक्रमण से सुरक्षित रहता है।

नवरात्रियों में प्रातः एवं रात्रि को माँ के नवार्ण मंत्र का १०८ बार जप अवश्य करें। 

नवार्ण मंत्र : 

“ॐ ऐँ ह्रीं क्लीं चामुण्डाये नमः “

नवरात्रियों के नौ दिनो में देवी के विभिन्न स्वरूप का पूजन निम्न रूप से किया जाता है। 

प्रथम नवरात्रि  – शैलपुत्री
द्वितीय नवरात्र  – ब्रह्मचारिणी
तृतीय नवरात्र  – चंद्रघंटा
चतुर्थ नवरात्र  – कुष्मांडा
पंचमी नवरात्र  – स्कंदमाता
षष्ठी नवरात्र  – कात्यायनी
सप्तमी नवरात्र  – कालरात्रि
अष्टमी नवरात्रि  – महागौरी
नवमी नवरात्र  – सिद्धिदात्री

कई लोग अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं एवं कई नवमी पर बाल कन्याओं की पूजा के साथ नवरात्रि का  उद्यापन करते हैं।  बाल कन्याओं की पूजा की जाती है और उन्हे हलवे, पूरी , गिफ़्ट आदि दे कर  नवरात्र व्रत का उद्यापन किया जाता है।

नीचे दिए गए विडीओ में जाने कलश स्थापना करने की विधि एवं साथ ही साथ कौन से दिन माँ  के किस स्वरूप की करें पूजा एवं उन्हें कौन सा भोग लगाएँ या फिर कौन से फूल अर्पित करें की माँ  हो प्रसन्न एवं करें आपकी हर मनोकामना पूर्ण। 

कलश स्थापना मुहूर्त :

नवरात्रि की प्रतिपदा में कलश स्थापन किया जाता है। कलश स्थापना करने से साधक माँ एवं समस्त देवी देवताओं का आवहन करते हैं एवं उन्हें साक्षी मान कर पूजन करते हैं। इस बात का अवश्य ध्यान रखें की चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग होने पर कलश स्थापना नहीं करनी चाहिए। 

प्रतिपदा तिथि शुरू : 8 am (12 April 2021) से 10:16 am  ( 13th April 2021 तक).

उदया  तिथि 13 April को रहेगी, नवसंवत्सर १३ अप्रैल २०२१, मंगलवार से शुरू होगा।

13 April 2021 को प्रातः काल  5:58 am से 10:14 am तक  में कलश स्थापित करें। 

अभिजीत मुहूर्त्त : 11:56 am – 12: 47 pm

शुभ चौघड़िया : लाभ : १०:४६ – १२:२२ ,       अमृत : १२:२२ – १३:५८

राहू काल  : 15:34 – 17:10  ( घट स्थापना के लिए निषेध है)

संधि पूजन : अष्टमी एवं नवमी तिथि की संधि में देवी  चामुण्डा का  हवन किया जाता है। 20/21 April की मध्य रात्रि को संधि पूजन होगा।

संधि  पूजन मुहूर्त : प्रातः 12:19 am – 1:07 am ( 21st April 2020 )

प्रभु श्री राम जयंती : 21 अप्रैल 2021 को  राम नवमी का पुण्य पर्व भी मनाया जायेगा।

राम नवमी मध्याहन मुहूर्त : 11:02 13:38 

नवमी तिथि : 12:43 am ( 21st April ) – 12:35 am ( 22nd April)

नवरात्रि पारण : २२ अप्रैल २०२१ ।

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