सनातन धर्म में अमावस्या तिथि को आत्मचिंतन, पितृ तर्पण और आध्यात्मिक साधना का विशेष दिवस माना गया है। किंतु जब अमावस्या सोमवार के दिन आती है, तब वह “सोमवती अमावस्या” कहलाती है, जिसका महत्व अनेक गुना बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में 15 जून को पड़ने वाली सोमवती अमावस्या और भी अधिक विशेष है क्योंकि यह पवित्र पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) के दौरान आ रही है।
ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार यह दुर्लभ संयोग पितृ दोष, चंद्र दोष, शनि दोष, राहु-केतु जनित बाधाओं तथा जीवन में चल रही अनेक प्रकार की रुकावटों को दूर करने का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करता है। इस दिन किए गए जप, तप, दान, स्नान और उपासना का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
पुरुषोत्तम मास को स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। पुराणों में वर्णित है कि जब अधिक मास को अन्य मासों की तुलना में तिरस्कार का सामना करना पड़ा, तब भगवान विष्णु ने उसे अपना नाम “पुरुषोत्तम मास” प्रदान किया और इसे विशेष पुण्यदायी घोषित किया।
सोमवार भगवान शिव का दिन माना जाता है और अमावस्या पितरों को समर्पित तिथि है। जब सोमवार, अमावस्या और पुरुषोत्तम मास का संगम होता है, तब यह त्रिवेणी योग साधकों के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
यह दिन तीन प्रमुख शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है—
इसी कारण इस दिन किए गए धार्मिक कर्मों से जीवन के अनेक अदृश्य अवरोध समाप्त होने लगते हैं।
स्कंद पुराण तथा पद्म पुराण में वर्णित है कि सोमवती अमावस्या पर पीपल वृक्ष की पूजा करने से भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी दोनों की कृपा प्राप्त होती है। पीपल को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का निवास स्थान माना गया है।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक निर्धन स्त्री ने सोमवती अमावस्या का व्रत रखकर पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमा की। उसकी निष्ठा और श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसके परिवार को अकाल मृत्यु, दरिद्रता और दुर्भाग्य से मुक्त किया।
यही कारण है कि आज भी विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इस व्रत का पालन करती हैं।
अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में स्थित होते हैं। इससे मन और आत्मा के बीच विशेष ऊर्जा प्रवाह उत्पन्न होता है।
ज्योतिष के अनुसार यह दिन विशेष रूप से निम्न दोषों की शांति के लिए प्रभावी माना जाता है—
यदि कुंडली में सूर्य, राहु, केतु या नवम भाव प्रभावित हो तो पितृ दोष के संकेत मिलते हैं।
लक्षण:
उपाय:
चंद्रमा मन, माता और मानसिक शांति का कारक है।
लक्षण:
यदि शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अशुभ दृष्टि चल रही हो तो सोमवती अमावस्या विशेष लाभकारी मानी जाती है।
उपाय:
राहु और केतु जीवन में भ्रम, अचानक समस्याएं और मानसिक अस्थिरता उत्पन्न कर सकते हैं।
उपाय:
“ॐ पितृभ्यो स्वाधाय”
इस मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।
“ॐ नमः शिवाय”
यह पंचाक्षरी मंत्र चंद्र दोष, मानसिक तनाव और नकारात्मकता को दूर करने वाला माना गया है।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
पुरुषोत्तम मास में इस मंत्र का जप विशेष फलदायी माना गया है।
“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”
यह मंत्र रोग, भय और ग्रहजनित कष्टों से रक्षा करता है।
प्रातःकाल पीपल वृक्ष में जल अर्पित करें तथा 108 परिक्रमा करें।
संध्या समय पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं।
पूर्वजों के नाम से जल, तिल और कुश द्वारा तर्पण करें।
गाय को हरा चारा, गुड़ और रोटी खिलाएं।
जरूरतमंदों को भोजन करवाना इस दिन अत्यंत शुभ माना गया है।
पुरुषोत्तम मास में विष्णु सहस्रनाम का पाठ विशेष पुण्य प्रदान करता है।
15 जून 2026 की पुरुषोत्तम मास की सोमवती अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, पितृ कृपा और ग्रह दोष निवारण का एक दिव्य अवसर है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए जप, दान, तर्पण और पूजा-अर्चना व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
सनातन परंपरा में कहा गया है कि जब पितर प्रसन्न होते हैं, तब देवता स्वयं मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए इस पावन सोमवती अमावस्या पर अपने पूर्वजों का स्मरण करें, भगवान शिव और श्रीहरि विष्णु की उपासना करें तथा ग्रह दोषों की शांति हेतु बताए गए उपायों का पालन करें। निश्चित रूप से यह दिन आपके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और सौभाग्य के नए द्वार खोल देगा।
Nandita Pandey
AstroTarotloger , Energy Healer , Spiritual Guide
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