१० नवम्बर – १४ नवम्बर का दीपावाली महापर्व , पूजन मुहूर्त, विधि, माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय,

दीपावली के पँच दिवसीय महापर्व की आप सभी को अनन्त  शुभकामनाएँ। 

कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का महा निशित काल मनाया जाता है। इस वर्ष १० नवम्बर २०२३ से दीपावली का महापर्व शुरू हो रहा है जो १४ नवम्बर २०२३, भाई दूज पर समाप्त होगा।

दीपावली के इस महापर्व के इन पाँच दिनो का तिथियों का विवरण निम्न प्रकार से है।

१० नवम्बर के पर्व : 

धन तेरस , यम दीप, महालक्ष्मी एवं कुबेर पूजन, धनवंतरी पूजन :  

त्रयोदशी तिथि : 12 नवम्बर , 12:35 pm – 1:57 pm ( 11th November 2023)

प्रदोष काल : साँय 5:30 pm- 8:08 pm तक ,  वृषभ लग्न : साँय 5:47- रात्रि 7:43 pm तक

पूजा मुहूर्त – सायं काल : 5:47 pm – 7:43 pm  

यम दीपम दान मुहूर्त :  10 नवम्बर २०२3 को प्रदोष काल में साँय 5:47 pm – 7:43 pm तक 

धन त्रयोदशी के दिन घर के मुख द्वार में यमराज के नाम का एक चौमुखी दीप  दक्षिण दिशा की तरफ़ प्रज्वल्लित अवश्य करें।इस दीये में सरसों का तेल डालें एवं एक सिक्का, कौड़ी, लौंग, खील डालें। एक थाल में  घर के सदस्यों की गिनती बराबर मुट्ठी चावल डाल कर इस चौमुखी दीये को उस पर रखें एवं यमराज से प्रार्थना करें की कोई भी विपत्ति, अकाल मृत्यु या फिर किसी भी प्रकार की सेहत से समबंधित कष्ट इस घर से दूर रहें।

इस दिन घर में सुख समृद्धि प्राप्त करने के लिए बर्तन, स्वर्ण, चाँदी आदि आभूषण भी ख़रीदे जाते हैं, थोड़ा सा धनिया, नमक एवं झाड़ू भी आज के दिन अवश्य ख़रीदें एवं खील बताशों के संग उन्हें माता लक्ष्मी एवं गणपति के समक्ष अर्पित करें।

कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे एवं इसलिए आज के दिन बर्तन आदि भी ख़रीदना शुभ माना जाता है।  वह अच्छी सेहत के देवता भी माने जाते हैं। इसीलिए इस दिन को धन तेरस भी कहा जाता है।

इस दिन मुख्य तौर पर माता लक्ष्मी, भगवान धनवंतरी एवं कुबेर देवता की पूजा का विधान है।

धनतेरस के दिन ख़रीदारी करने के शुभ मुहूर्त :

इस दिन १० नवम्बर को धन त्रयोदशी पड़ेगी एवं इस दिन विशेषकर त्रिपुष्कर योग भी बन रहा है, यानी की किसी भी शुभ कार्य / ख़रीदारी करने से उसका तिगुना फल प्राप्त होता है। इस दिन हस्त नक्षत्र ११ :४३ मिनट से शुरू होगा एवं पूरे दिन रहेगा । इस नक्षत्र में किसी भी प्रकार की ख़रीदारी करना अत्यन्त शुभ माना जाता है। 

 प्रातः १२:५६ मिनट से दोपहर २:०६ मिनट तक

 साँय ४:१६ मिनट से ५:२६ मिनट तक समय शुभ है। 

राहू काल : प्रातः १०:४३ मिनट से दोपहर १२:०५  मिनट तक ( इस समय शुभ कार्य वर्जित हैं) 

संध्या दीप दान का मुहूर्त : १० नवम्बर साँय ५:४७- साँय ७:४३ बजे तक 

हनुमान जी पूजन एवं काली चौदस रात्रि पूजन : ११ नवम्बर अर्ध रात्रि ११:३९ – १२:३२ (१२ नवम्बर) तक 

११ नवम्बर के पर्व : 

नरक चतुर्दशी / छोटी दीपावली , काली चौदस, हनुमान जयंती 

चतुर्दशी तिथि : दोपहर १:५७ मिनट (११ नवम्बर) से दोपहर २:४४ मिनट ( १२ नवम्बर) तक,

रूप चौदस या नरक चतुर्दशी को रात्रि प्रदोष काल में घर के मुख्य द्वार में चौमुखी दिया जलाएँ। इस दिन हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है, माना जाता है की इस रात्रि को नकारात्मक शक्तियाँ अत्यंत  प्रबल रूप में घूमती हैं एवं हनुमान जी के पूजन एवं स्मरण से उनका नाश होता है एवं अकाल मृत्यु से मुक्ति प्राप्त होती।

संध्या को ५:४७ बजे से लेकर साँय ७:४३ बजे तक दीप प्रज्वल्लित करने का मुहूर्त है। 

काली चौदस एवं हनुमान जयंती पूजन मुहूर्त : अर्ध रात्रि 11:39 pm ( 11th November ) – 12:32 am ( 12th November)

नरक चतुर्दशी तिथि अभ्यंग स्नान ( तिल के तेल से ऊबटन बना कर लगाएँ फिर स्नान करें) :

अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व नरक चतुर्दशी, अमावस्या को माना जाता है। इस स्नान को नरक चतुर्दशी को करने का विशेष विधान है एवं अत्यंत शुभ माना जाता है। स्नान  में तिल का ऊबटन लगा कर फिर स्नान करने से कष्टों से मुक्ति मिलती है।

अभ्यंग स्नान मुहूर्त, ४ नवम्बर को प्रातः  काल 5:28 am से प्रातः 6:41 am तक मुहूर्त रहेगा।

 अभ्यंग स्नान का मुहूर्त इस वर्ष दीपवाली वाले दिन प्रातः काल में पड़ेगा। शास्त्रों के अनुसार, जब भी चतुर्दशी तिथि सूर्योदय से पहले एवं उसी दिन सूर्य अस्त के पश्चात अगर अमावस्या पड़ती है तो नरक चतुर्दशी में अभ्यंग स्नान एवं दीपवाली एक ही दिन मनाई जाती है। 

 

महादीपावली पर्व पूजन मुहूर्त : 12 नवम्बर 2023

दीपावाली की रात्रि को दीप प्रज्वल्लित कर माँ महालक्ष्मी जी का पूजन गणपति देव के साथ किया जाता है। ऐसा माना जाता है की इस दिन माता लक्ष्मी धरती पर विचरण करती हैं एवं अपने भक्त जनों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।

लक्ष्मी पूजा का सबसे उत्तम पूजन मुहूर्त प्रदोष काल में स्थिर लग्न में माना जाता है। व्यापारी आदि के लिए दोपहर का समय लक्ष्मी पूजन के लिए बेहतर होता है। अर्ध रात्रि को महा लक्ष्मी जी के पूजन एवं हवन का विशेष महत्व होता है एवं इस समय की गयी पूजा यंत्र तंत्र एवं मंत्र की शक्ति जागृत होती हैं।

गृहस्थ लोगों के लिए प्रदोष काल में किया गया पूजन उत्तम होता है।

प्रदोष काल  पूजन मुहूर्त : साँय ५:३९ मिनट से रात्रि ७:३५ मिनट तक

प्रदोष काल : साँय ५:२९ मिनट से साँय ८:०८ मिनट तक

वृषभ काल : साँय ६:०९ मिनट से ८:०४ मिनट तक

दीपवाली के दिन चौघड़िया  मुहूर्त : 

दोपहर २:४४ मिनट से २:४७ मिनट तक

साँय ( शुभ, अमृत, चर चौघड़ियाँ मुहूर्त) : साँय ५:२९ मिनट से रात्रि १०:२६ मिनट तक

राहू काल : साँय ४:०८ मिनट से साँय  ५:२९ मिनट तक ( इस समय कोई भी शुभ कार्य करना टालें) 

 

इस दिन चोपड़ा पूजन एवं माँ शारदा का पूजन भी बहुत विधि विधान से किया जाता है।

संध्या महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त / दीप प्रज्वल्लित मुहूर्त  विभिन्न स्थानों का  :

नयी दिल्ली : 5:39 pm – 7:35 pm 
मुंबई : 6:12 pm – 8:12 pm
गुड़गाँव : 5:40 pm – 7:36 pm
चेन्नई  : 5:52pm – 7:54 pm
जयपुर : 5:48 pm – 7:44 pm
हैदराबाद : 5:52 pm – 7:53 pm 

चंडीगढ़ : 5:37 pm – 7:32 pm

कलकत्ता : 5:05 pm – 7:03 pm 

बेंगलुरु : 06:03 PM to 08:05 PM 

अहमदाबाद : 6:07 pm – 8:06 pm 
नॉएडा : 5:39 PM to 7:34 PM 
पूना  : 06:09 PM to 08:09 PM 
दीपावली महा निशीतकाल पूजन : 
काली पूजन निशित काल : 11:39 pm (12th November) – 12:31 am ( 13th November) 
सिंह लग्न : 12:10 am ( 12th November)  – 2:27 am ( 13th November )
अर्ध रात्रि महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त (सिंह लग्न) :
मध्य रात्रि को 12:10 am( १३ नवम्बर) – 12:32 am ( १३ नवम्बर) का  बन रहा है। 
१३ नवम्बर के पर्व :
गोवर्धन पूजन/ अन्नकूट पूजन/ बाली पड़वा :
प्रतिपदा तिथि शुरू : दोपहर २:५६  (१३ November ) – दोपहर २:३६ मिनट तक ( १४ नवम्बर)
प्रातः  काल पूजन मुहूर्त : 6:43 am – 8:52 am
इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र के अभिमान पर विजय प्राप्त की थी एवं अपने गाँव वासियों को गोवर्धन पर्वत उठा कर उसमें शरण दी थी। इसी दिन अन्नकूट पूजन भी होता है एवं भगवान कृष्ण को ५६ भोग भी लगाया जाता है।
महाराष्ट्र में इस दिन बाली पड़वा के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है की इस दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बाली पर विजय प्राप्त की थी एवं उसे पाताल लोक में भेजा था। महाबलशाली बाली को भगवान विष्णु जी के आशीर्वाद से इस दिन वापस धरती में आने का वरदान भी प्राप्त हुआ था एवं बाली एक दिन के लिए पृथ्वी लोक में इस दिन आते हैं।
१४ नवम्बर के पर्व : 
भाई दूज, यम द्वितीया 
द्वितीया तिथि शुरू प्रातः 2:36 pm  ( 14 नवम्बर) से  प्रातः 1:47 pm ( 15 नवम्बर) तक
अपराह्न काल भई को तिलक का समय : दोपहर 1:10 pm से 3:19 pm  मिनट तक। 

इस पूरे पंचदिवसों में महा लक्ष्मी के पूजन का विधान है एवं इन्हें गणपति, माता सरस्वती एवं भगवान विष्णु के साथ पूजा जाता है। भगवान राम के रावण वध के पश्चात, १४ वर्ष के वनवास के बाद, अयोध्या वापसी के उपलक्ष्य में में भी दीप प्रज्वल्लित किए जाते हैं।

ये पंचदिवसीय महापर्व निम्न प्रकार से हैं : 

१ : धन तेरस / धन त्रयोदशी  : १० नवम्बर 

१० नवम्बर  को धन तेरस पड़ेगा। इस दिन धन रक्षक कुबेर देव की पूजा का विधान है। साथ ही में भगवान धनवांतरि ( जो सेहत के देवता हैं एवं समुद्र मंथन के समय अमृत के साथ प्रकट हुए थे) उनका पूजन भी किया जाता है।

इस दिन संध्या के समय घर के मुख्य द्वार में दोनो तरफ़ दीप प्रज्वलित करें। पूजन स्थान पर कुबेर देवता को उत्तर दिशा पर स्थापित करें एवं भगवान गणपति, भगवान धनवांतरि, कुबेर देव, माता लक्ष्मी का स्मरण  कर पूजन करें तो वर्ष भर में सुख समृद्धि बनी रहती है एवं समस्त परिवारजन की अच्छी सेहत रहती है। पूजन सामग्री में पीली वस्तुएँ जैसे पीले फूल, हल्दी, पीले चावल, पीला चंदन, लड्डू आदि भोग  में अर्पित कर सकते हैं।

इस दिन स्वर्ण, आभूषण आदि ख़रीदने का विधान है एवं घर के लिए नए बर्तन आदि भी ख़रीदे जाते हैं। आज सबूत धनिया एवं गुड को प्रसाद स्वरूप भी चडाया जाता है।

धन तेरस में पूजन समय उपरोक्त लिखा है : 

निम्न मंत्रों का १०८ बार अवश्य करें जप :

” ॐ  धनवांतराय नमः ” ,

 “ॐ  धनकुबेराय नमः” /  “ॐ वित्तेश्वराय नमः “

“ॐ  श्रीं  श्रिये नमः “

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः॥ 

धनतेरस पूजा को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस का दिन धनवंतरि त्रयोदशी,  जो कि आयुर्वेद के देवता का जन्म दिवस है, के रूप में भी मनाया जाता है।

यम दीपम : इसी दिन असामयिक मृत्यु से बचने के लिए  यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाया जाता है जिसे यम दीपम  के नाम से जाना जाता है और इस धार्मिक संस्कार को त्रयोदशी तिथि के दिन दक्षिण दिशा में किया जाता है।

घर में मुख्य द्वार पर यमराज के नाम का एक दीप अवश्य जलाएँ। उसमें एक सिक्का, कौड़ी, हल्दी, गोमती चक्र डाल कर दीप प्रज्वल्लित करें।  

 

काली चौदस एवं हनुमान पूजन :
मुख्यतः गुजरात प्रदेश में  काली चौदस/ भूत चौदस  कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की अर्ध रात्रि को मनायी जाती है। साथ ही  हनुमान जी की भी पूजा की जाती है। ११ नवम्बर की ही रात्रि को माँ काली के पूजन एवं हनुमान जी का पूजन इस वर्ष रहेगा।
माना जाता है की इस नरक चतुर्दशी की अर्धरात्रि  को नकारात्मक शक्तियाँ पूर्ण जोर शोर से घूमंती हैं। इस समय माँ काली एवं हनुमान जी ( दोनो को ही कलयुग में जागृत स्वरूप में पूजा जाता है) की विशेष पूजा करने से घर परिवार में राज, शोक, दोष सभी से मुक्ति प्राप्त होती है एवं जीवन में सुख समृद्धि बड़ती है।

काली चौदस एवं हनुमान जयंती पूजन मुहूर्त : अर्ध रात्रि 11:39 pm ( 11th November ) – 12:32 am ( 12th November)

२ : नरक चतुर्दशी / छोटी दीपावली  :

11 नवम्बर को नरक चतुर्दसी, रूप चौदस या छोटी  दीपावली मनाई जाएगी। 

नरक चतुर्दशी/ रूप चौदस की पौराणिक कथा :

इस दिन श्री कृष्ण ने नर्कसुर का वध कर सभी को उसके द्वारा किए गए नरक स्वरूप पापों से मुक्ति दिलवायी थी। नरकासुर ने १६००० युवतियों को अपने अधीन बंदी बना कर रखा था जिन्हें श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध कर मुक्त किया। उनसे औपचारिक विवाह कर उन्हें समाज में सम्मान की स्तिथी दिलायी।

इसी उपलक्ष्य में इस दिन दीप दान की विशेष परम्परा है।

आज रात्रि को यमराज के अलावा श्री काल भैरव की भी पूजा की जाती है। काल भैरव, शिव जी का रौद्र स्वरूप हैं। समस्त काशी इन्हें के अधीन है।  घर में दीप प्रज्वल्लित कर सभी देवी देवताओं का आहवाहन कर पूजन करें। शिव जी पर चवाल की खीर भी अर्पित करें।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी यानी नरक चौदस को सायं-काल घर से बाहर नरक-निवृत्ति के लिए धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-रुपी चार बत्तियों का दीपक यम-देवता के लिए सर्वप्रथम जलाना चाहिये।
इसके पश्चात् गो-शाला, देव-वृक्षों के नीचे, रसोई-घर, स्नानागार आदि में दीप जलाये। इस प्रकार ‘दीप-दान’ के बाद नित्य का पूजन करे।

३ : दीपावली महा रात्रि : 12 नवम्बर 

दीपावली के महापर्व की मुख्य रात्रि 12 नवम्बर की रात्रि को मनायी जाएगी। यह दिन समस्त विघ्नों को दूर करने वाली रात्रि है एवं माता लक्ष्मी का विधिवत पूजन करने से जीवन में अष्ट लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है एवं पूरे वर्ष भर में घर परिवार में सुख समृद्धि बनी रहेगी।

रात्रि के महा निशित काल में माता लक्ष्मी के पूजन का विशेष विधान है। उनके नाम का हवन करना एवं मंत्रों द्वारा विधिवत जप करने से माता लक्ष्मी की कृपा समस्त परिवार में बनी रहती है। गणपति एवं माता लक्ष्मी के साथ श्री हरी विष्णु जी, माँ सरस्वती, माँ काली, हनुमान जी एवं शिव जी के पूजन का भी विधान है।

पूजन मुहूर्त : इस ब्लॉग की शुरुआत में, उपरोक्त लिखा हुआ है। 

रात्रि के समय लक्ष्मी चालीसा या “श्री सुक्तम” का पाठ अवश्य करें। माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र का जप करने से वह मंत्र सिद्ध हो जाएगा। कमल गट्टे की माला से पूजन करना विशेष कर शुभ होता है।
माता के किसी भी निम्न मंत्रों का जप कम से कम १०८ बार अवश्य करें :
१ : “ॐ श्रीं श्रिये नमः “
२ : “ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः” 
३ : “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:”
४ : “ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ”
माता लक्ष्मी के मंत्रों के साथ भगवान गणपति के मंत्रों का भी जप करना चाहिए।
माता का कौड़ी, लौंग, इलाइची, गोमती चक्र, लघु नारियल, एकाक्षी नारियल, सिंदूर, काजल, दाहिनी शंख के साथ पूजन करना विशेषकर शुभ होगा।
माता लक्ष्मी-गणेश पूजा के अतिरिक्त इस दिन नवग्रह पूजन, षोडश मात्रिकाओं का पूजन,  कुबेर पूजन, माँ काली, माँ सरस्वती पूजन, दीप मालिका पूजन  एवं बही खाता पूजन भी किया जाता है।
काली पूजा :
बंगाल, उड़ीसा, असम में दीपावली के महा निशीथ काल में माँ काली का पूजन किया जाता है।

४ : गोवर्धन पूजन : 13 नवम्बर 

दीपावली के चौथे दिन गोवर्धन पूजन किया जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजन होता है। इस दिन भगवान कृष्ण का इंद्र देव पर विजय के उपलक्ष्य में पूजन किया जाता है।

गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजन भी कहा जाता है। इस दिन गेहूँ, चावल जैसे अनाज, बेसन से बनी कढ़ी और पत्ते वाली सब्जियों से बने भोजन को पकाया जाता है और भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है।

भगवान विष्णु की राजा बाली पर विजय उनके वामन अवतार द्वारा हुई थी। इसके पश्चात बाली को पाताल लोक में वास करना पड़ा था।  यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बालि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।

इसी दिन अमूमन गुजराती नव वर्ष भी पड़ता है।

५ : भाई दूज/ यम द्वितीया : 14 नवम्बर 2023

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज मनाया जाता है|  इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है|

पौराणिक कथा अनुसार यमराज ने अपने बहन यमुना को वचन दिया था कि जो भी भाई इस दिन अपने बहन के घर जा कर भोजन ग्रहण करेगा वह उनके संरक्षण में रहेगा एवं उसकी आकाल मृत्यु कभी नहीं  होगी।  यह पर्व भाई बहन के प्रेम का प्रतीक है ।

भाई दूज तिलक मुहूर्त – दोपहर १:१० बजे से ३:१९ मिनट तक 

एक और पौराणिक कथा अनुसार, श्री कृष्ण  नरकासुर  का वध कर इसी दिन यानी कार्तिक शुक्ल द्वितीया को द्वारका पहुँचे, इसी उपलक्ष्य में उनकी बहन सुभद्रा ने उन्हें तिलक लगा, फूल छड़ा कर, आरती कर,  कर उनका स्वागत किया। तभी से इस दिन भाई के मस्तक में तिलक लगाने की प्रथा चली है।

दीपावली में और भी कई निवारण आदि किए जाते हैं। आप हमारे youtube  channel  में उनसे सम्बंधित  विडीओ देख सकते हैं, जो आपके घर में सुख समृद्धि, यश वैभव लेकर आएँगे।

आपके एवं आपके परिवार पर माता लक्ष्मी एवं गणपति की विशेष कृपा बरसे एवं जीवन में सुख समृद्धि से परिपूर्ण हो।

नन्दिता पाण्डेय – ज्योतिषाचर्या

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