२५ मई ’18 को पड़ रही है “पद्मिनी” / “कमला” एकादशी ….. जाने क्या है इसका महत्व,,,,, क्यों मनायी है पद्मिनी एकादशी हर तीसरे वर्ष में…. पद्मिनी एकादशी से होगी हर मनोकामना पूरी ….. !!

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पद्मिनी  एकादशी(२५ मई ’18 )

 

हिन्दू नववर्ष की पुरुषोत्तम मास की  एकादशी,  यानी की अधिक ज्येष्ठ माह  के शुक्ल पक्ष पर पड़ने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी या कमला एकादशी के रूप में मनाया जाता है 

इस एकादशी के व्रत से सुख एवं समृद्धि  की प्राप्ति होती है वं किसी भी प्रकार के दान का कई गुणा फल मिलता है। इसे पद्मिनी  एकादशी के रूप में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु का विधि पूर्वरक पूजन करने से अपार एवं कभी ना ख़त्म होने वाले सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही साथ व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर प्रशस्त होता है। 

पद्म पुराण में यूधिष्ठर   एवं कृष्ण के संवाद में इस व्रत का उल्लेख मिलता है जहाँ कृष्ण भगवान यूधिष्ठर को इस व्रत की महिमा बताते हैं। 

वह कहते हैं की कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण पड़ने पर दान का जो असीम फल प्राप्त होता है उससे कई  गुणा अधिक फल इस व्रत को करने से होता है। इस व्रत को करने से कई जन्मों के पापों से मुक्ति  मिलती है एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है । 

त्रेता युग में भगवान राम को इस व्रत की महिमा महर्षि वशिष्ठ ने बतलायी थी एवं उनके लिए विजय का मार्ग प्रशस्त किया था। उस युग में भगवान राम ने भी एकादशी के व्रत का पालन कर रावण पर विजय प्राप्त की थी। 

 

व्रत की विधि :        

 

दशमी की रात्रि से ही भोजन पश्चात, साधक रात भर भगवान विष्णु का स्मरण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। प्रातःकाल स्नान आदि कर शुद्ध होकर ,  भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से फिर कच्चे दूध से फिर गंगाजल से स्नान करवाएँ। उसके बाद रोलिअक्षत, अष्टगंध  से अभिषेक करें। धूपदीपफूलनैवैद्य आदि चड़ाएँ  

 

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ” का ०८ बार जप करें।  

 

उसके बाद धरती को स्वच्छ कर ,  वहाँ मिट्टी एवं गोबर के लेप से उस स्थान को शुद्ध करें जहाँ आपने भगवान की मूर्ति स्थापित करनी है उस में गंगा जल छिड़कें एक कलश स्थापित करें,  उस पर जल भरकर अंदर सिक्का,  सुपारी डाल कर पाँच पल्लव द्वारा उस के मुख पर नारियल भगवान विष्णु का ध्यान कर रक्खें.  उसके पश्चात, रोलि अक्षतधूपदीपफूल नैवदय आदि से वृक्ष का पूजन रें। अपने घर,  सुख समृद्धि,  अच्छी सेहत,  मोक्ष की प्राप्ति का ध्यानकर प्रार्थना करें। 

 

एकादशी के व्रत का पारण दूसरे दिन द्वादशी तिथि के पूर्ण होने से पहले किया जाता है । व्रत का पारणदानपुण्य आदि कर करें। 

 

पद्मिनी एकादशी की पौराणिक मान्यता

एक समय माहिषमतीपुरी में हैहय महाराज के वंशज कृतवीर्य नामक राजा राज्य करता था। वैसे तो राजा की १००० पत्नियाँ थीं लेकिन फिर भी वह पुत्र सुख से वंचित था। राजा को चिन्ता लगी रहती की उसके पश्चात राज्यभार को कौन सम्भालेगा।  राजा ने हर तरह के वैध, चिकित्सा आदि द्वारा उपाय किया लेकिन फिर भी सफलता हाथ नहीं लगी। सब तरफ़ से हार जाने के पश्चात राजा ने इशवार की शरण में जाने की सोची एवं तपस्या का प्राण किया। वह अपनी पटरानी जो की इश्वाकु वंश के राजा हरिशचंद्र की प्रिय पुत्री पद्मिनी थीं। दोनो ने राज पाट अपने मंत्रियों को सौंप कर वन में प्रस्थान किया। कई हज़ार वर्षों तक तप के पश्चात भी राजा की इच्छा पूर्ण नहीं हुई। उनकी ऐसी स्तिथी देख सती अनुसूया ने पद्मिनी को मलमास की विशेषता बताई और कहा की सब मासों से सबसे महत्वपूर्ण अधिक मास या मलमास होता है। इस मास में श्री हरी का पूजन विशेष फलदायी होता है। यह मलमास हर तीसरे वर्ष आता है। माल मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत का पूर्ण रूप से पालन करने से श्री नारायण प्रसन्न होकर तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्ति का वरदान देंगे।  

महारानी ने विधि पूर्वक आने वाली मलमास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत किया। श्री हरी के आशीर्वाद से रानी को शीघ्र ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उन्होंने उसका नाम कार्तवीर्य रखा जो भविष्य में तीनो लोकों में बहुत ही बलशाली, साथ ही  शीलवान, एवं पराक्रमी राजा बना। 
क्योंकि इस व्रत की कीर्ति  महारानी पद्मिनी की तपस्या के फल से चारों तरफ़ फैली इसीलिए इस व्रत को पद्मिनी एकादशी व्रत भी कहा जाता है।
 श्री कृष्ण, इस व्रत की महिमा बताते हुए युधिष्ठर से कहते हैं की जो भी इस एकादशी के व्रत  का विधिपूर्वरक पालन करता है उसे यश, मान, सम्मान, सब मिलता है एवं वह सभी प्रकार के सुख भोग कर बैकुंठ में वास करता है।

वह पुनः कहते हैं, जो कोई भी इस व्रत को करता है, उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है एवं वह भी किसी भी प्रकार की पीड़ाओं से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। 

 

एकादशी व्रत में क्या वर्जित है 

 

एकादशी के व्रत में आप को काँसे के उपयोग से बचना चाहि,  साथ ही में चावल ,  मसूर की दाल,  मधु का पान, चावल, चने का शाक नहीं ग्रहण करना चाहिए । माँस– मदिरा से दूर रहना चाहिए। 

व्रती को नमक,  तेल एवं अन्न का त्याग कर फलाहार करना चाहिए । 

 

आज क्या करें 

 

अपरा  एकादशी का यह व्रत, समस्त रोगों एवं पापों से मुक्ति वाला व्रत है। इस व्रत को करने से १००० गौ दान का फल मिलता है। चारों धामों के पुण्य का फल मिलता है। व्रत का पालन करने वाला अपार सुख एवं समृद्धि का स्वामी हो जाता है। 

 

इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें,  एक वक़्त में भोजन ग्रहण करें,  रात्रि में जाग कर भगवान विष्णु का स्मरण कर उन की कथा पड़े या फिर भजन आदि करें। दूसरे दिन प्रातः काल उठ कर व्रत का पारण ग़रीबों को भोजन खिला कर करें । 

 

व्रत के पारण का समय : २६ मई प्रातः काल ५:२९ – ८:१२

 

व्रत उपवास के नियम का तो पालन करने सेघर में सुख समृद्धि बनी रहती है एवं रोगशोक से मुक्ति मिलती है । 

 

हिन्दू नववर्ष की पुरुषोत्तम मास की एकादशी, यानी की अधिक ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष पर पड़ने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी या कमला एकादशी के रूप में मनाया जाता है ।

इस एकादशी के व्रत से सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है एवं किसी भी प्रकार के दान का कई गुणा फल मिलता है। इसे पद्मिनी एकादशी के रूप में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु का विधि पूर्वरक पूजन करने से अपार एवं कभी ना ख़त्म होने वाले सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही साथ व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर प्रशस्त होता है।

पद्म पुराण में यूधिष्ठर एवं कृष्ण के संवाद में इस व्रत का उल्लेख मिलता है जहाँ कृष्ण भगवान यूधिष्ठर को इस व्रत की महिमा बताते हैं।

वह कहते हैं की कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण पड़ने पर दान का जो असीम फल प्राप्त होता है उससे कई गुणा अधिक फल इस व्रत को करने से होता है। इस व्रत को करने से कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।

त्रेता युग में भगवान राम को इस व्रत की महिमा महर्षि वशिष्ठ ने बतलायी थी एवं उनके लिए विजय का मार्ग प्रशस्त किया था। उस युग में भगवान राम ने भी एकादशी के व्रत का पालन कर रावण पर विजय प्राप्त की थी।

व्रत की विधि :

दशमी की रात्रि से ही भोजन पश्चात, साधक रात भर भगवान विष्णु का स्मरण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। प्रातःकाल स्नान आदि कर शुद्ध होकर , भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से फिर कच्चे दूध से फिर गंगाजल से स्नान करवाएँ। उसके बाद रोलि, अक्षत, अष्टगंध से अभिषेक करें। धूप, दीप, फूल, नैवैद्य आदि चड़ाएँ ।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ” का १०८ बार जप करें।

उसके बाद धरती को स्वच्छ कर , वहाँ मिट्टी एवं गोबर के लेप से उस स्थान को शुद्ध करें जहाँ आपने भगवान की मूर्ति स्थापित करनी है ।उस में गंगा जल छिड़कें , एक कलश स्थापित करें, उस पर जल भरकर अंदर सिक्का, सुपारी डाल कर पाँच पल्लव द्वारा उस के मुख पर नारियल भगवान विष्णु का ध्यान कर रक्खें. उसके पश्चात, रोलि अक्षत, धूपदीप, फूल नैवदय आदि से वृक्ष का पूजन करें। अपने घर, सुख समृद्धि, अच्छी सेहत, मोक्ष की प्राप्ति का ध्यानकर प्रार्थना करें।

एकादशी के व्रत का पारण दूसरे दिन द्वादशी तिथि के पूर्ण होने से पहले किया जाता है । व्रत का पारण, दान, पुण्य आदि कर करें।

पद्मिनी एकादशी की पौराणिक मान्यता:
एक समय माहिषमतीपुरी में हैहय महाराज के वंशज कृतवीर्य नामक राजा राज्य करता था। वैसे तो राजा की १००० पत्नियाँ थीं लेकिन फिर भी वह पुत्र सुख से वंचित था। राजा को चिन्ता लगी रहती की उसके पश्चात राज्यभार को कौन सम्भालेगा। राजा ने हर तरह के वैध, चिकित्सा आदि द्वारा उपाय किया लेकिन फिर भी सफलता हाथ नहीं लगी। सब तरफ़ से हार जाने के पश्चात राजा ने इशवार की शरण में जाने की सोची एवं तपस्या का प्राण किया। वह अपनी पटरानी जो की इश्वाकु वंश के राजा हरिशचंद्र की प्रिय पुत्री पद्मिनी थीं। दोनो ने राज पाट अपने मंत्रियों को सौंप कर वन में प्रस्थान किया। कई हज़ार वर्षों तक तप के पश्चात भी राजा की इच्छा पूर्ण नहीं हुई। उनकी ऐसी स्तिथी देख सती अनुसूया ने पद्मिनी को मलमास की विशेषता बताई और कहा की सब मासों से सबसे महत्वपूर्ण अधिक मास या मलमास होता है। इस मास में श्री हरी का पूजन विशेष फलदायी होता है। यह मलमास हर तीसरे वर्ष आता है। माल मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत का पूर्ण रूप से पालन करने से श्री नारायण प्रसन्न होकर तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्ति का वरदान देंगे।

महारानी ने विधि पूर्वक आने वाली मलमास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत किया। श्री हरी के आशीर्वाद से रानी को शीघ्र ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उन्होंने उसका नाम कार्तवीर्य रखा जो भविष्य में तीनो लोकों में बहुत ही बलशाली, साथ ही शीलवान, एवं पराक्रमी राजा बना।
क्योंकि इस व्रत की कीर्ति महारानी पद्मिनी की तपस्या के फल से चारों तरफ़ फैली इसीलिए इस व्रत को पद्मिनी एकादशी व्रत भी कहा जाता है।

श्री कृष्ण, इस व्रत की महिमा बताते हुए युधिष्ठर से कहते हैं की जो भी इस एकादशी के व्रत का विधिपूर्वरक पालन करता है उसे यश, मान, सम्मान, सब मिलता है एवं वह सभी प्रकार के सुख भोग कर बैकुंठ में वास करता है।

वह पुनः कहते हैं, जो कोई भी इस व्रत को करता है, उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है एवं वह भी किसी भी प्रकार की पीड़ाओं से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।

एकादशी व्रत में क्या वर्जित है :

एकादशी के व्रत में आप को काँसे के उपयोग से बचना चाहिए, साथ ही में चावल , मसूर की दाल, मधु का पान, चावल, चने का शाक नहीं ग्रहण करना चाहिए । माँस- मदिरा से दूर रहना चाहिए।
व्रती को नमक, तेल एवं अन्न का त्याग कर फलाहार करना चाहिए ।

आज क्या करें :

अपरा एकादशी का यह व्रत, समस्त रोगों एवं पापों से मुक्ति वाला व्रत है। इस व्रत को करने से १००० गौ दान का फल मिलता है। चारों धामों के पुण्य का फल मिलता है। व्रत का पालन करने वाला अपार सुख एवं समृद्धि का स्वामी हो जाता है।

इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें, एक वक़्त में भोजन ग्रहण करें, रात्रि में जाग कर भगवान विष्णु का स्मरण कर उन की कथा पड़े या फिर भजन आदि करें। दूसरे दिन प्रातः काल उठ कर व्रत का पारण ग़रीबों को भोजन खिला कर करें ।

व्रत के पारण का समय : २६ मई प्रातः काल ५:२९ – ८:१२

व्रत उपवास के नियम का तो पालन करने से, घर में सुख समृद्धि बनी रहती है एवं रोग-शोक से मुक्ति मिलती है ।

2 thoughts on “२५ मई ’18 को पड़ रही है “पद्मिनी” / “कमला” एकादशी ….. जाने क्या है इसका महत्व,,,,, क्यों मनायी है पद्मिनी एकादशी हर तीसरे वर्ष में…. पद्मिनी एकादशी से होगी हर मनोकामना पूरी ….. !!”

  1. RAMESH KUMAR says:

    NANDITA JI, THIS IS ALL IN HINDI, PLEASE ENGLISH FOR ME TO READ !

    1. admin says:

      Thank you for your feedback… shall try making the videos in english too… stay blessed…!

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