भाद्रपद मास की शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को गणपति के प्रकाट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है। दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी से लेकर अनन्त चतुर्थी तक गणपति को अपने घर में अतिथि के रूप में स्वागत किया जाता है एवं उनकी हर प्रकार से सेवा की जाती है। इसके पश्चात उन्हें आदर पूर्वक जल में विसर्जित किया जाता है एवं उनसे अगले वर्ष दोबारा वापस उनके घर आने की विनती की जाती है।
“गणपति बप्पा मोरिया, अगले बरस तू जल्दी आ।”
बप्पा जब आपके घर में आते हैं तो आपके घर में ख़ुशियाँ लेकर आते हैं एवं जब वापस जाते हैं तो आपके घर की समास्त नकारात्मक ऊर्जा अपने साथ लेकर चले जाते हैं एवं आपके घर में केवल सकरात्मक ऊर्जा रह जाती है।
इन दस दिनो में आप गणपति का आतिथ्य डेड़ दिन, ३ दिन, ५ दिन, ७,९ ,१० दिन रख सकते हैं। जब गणपति घर में आते हैं तो आप उनका आतिथ्य मोदक, सिंदूर, दूर्वा घास, ग़ुल्हड़ के फूल के साथ करें। शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वल्लित करें, धूप दीप, नैवेद्य आदि द्वारा उनकी पूजा करें और उनके मंत्रों का जाप करें। घर में उन्हें विभिन्न पकवानो का भोग लगाएँ एवं अपने मित्र रिश्तेदारों को भी आमंत्रित कर उन्हें भी आरती में शामिल करें एवं उन्हें भी भोग का प्रसाद दें।
इस दौरान सात्विक आचरण रखें एवं दान पुण्य आदि में अपना समय व्यतीत करें। गणपति बप्पा की कृपा से जीवन में सुख शांति प्राप्त होगी।
गणपति के इस महा उत्सव में निम्नलिखित महा उपायों को करें तो आपके जीवन में सुख शांति आएगी एवं समस्त नकारात्मक ऊर्जाओं का विनाश होगा।
१ : इस महोत्सव में आप गणपति के मंत्रों का उच्चारण अवश्य करें, ऐसा करने से जीवन में सुख शांति अवश्य प्राप्त करेंगे।
२: गणपति के समक्ष एक लोटे जल में थोड़ा गंगाजल डालें एवं २१ दूर्वा घास भी एक मौली से बांध कर डाल दें। पूजा के पश्चात इस दूर्वा घास से लोटे के जल को पूरे घर में छिड़कें एवं मन ही मन गणपति मंत्र का जाप करते रहें।
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” ॐ गं गणपतये नम :”
३: गणपति को हल्दी अवश्य भेंट करें तो जीवन में सुखी रहेंगे। इस हल्दी को उनके विसर्जन के पश्चात पीस कर उसका तिलक रोज़ लगाने से जीवन में समस्त परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होगी।
महाभारत महाकाव्य को लिखने के लिए गुरु वेद व्यास जी ने गणेश जी से आग्रह किया की में वाचक बनूँगा एवं आप कृपया कर इस महाकाव्य को लिखते जाइए। गणपति ने इसी शर्त पर महाकाव्य लिखने को स्वीकार किया की वह बीच में उठेंगे नहीं एवं एक ही गति में इस महाकाव्य को लिखते जाएँगे। वेद व्यास जी मान गए। महाकाव्य को गणपति देव ने भादो मास की चतुर्थी तिथि से लिखा शुरू किया एवं अनंत चतुर्दशी तिथि तक लिखा।
महाकाव्य लिखते -लिखते गणपति जी को पसीने भी छूट रहे थे एवं उन्हें गर्मी भी लगने लगी। उन्हें ठंडक पहुँचने के लिए वेद व्यास जी ने उनके ऊपर गीली मिट्टी का लेप लगना शुरू किया लेकिन वह लेप भी सुख कर कड़क होता जाता।
जब अनंत चतुर्दशी वाले दसवें दिन महाभारत का महा काव्य पूरा हुआ तो वेद व्यास जी ने देखा की गणपति के शरीर की ऊर्जा से लीपी मिट्टी सख़्त हो गयी है एवं गणपति का शरीर अकड़ गया है। उनसे गणपति की यह स्तिथि देखी नहीं गई एवं तुरंत उन्होंने गणपति को पास ही जल धारा में डाला एवं उनके शरीर से मिट्टी को मलकर हटाया। ऐसा करने से गणपति को काफ़ी राहत महसूस हुई एवं वह वेद व्यास जी से प्रसन्न हुए एवं उन्हें वर दिया की जो भी आज से भादो मास के इन दिनो में मेरा पार्थिव रूप में अपने घर में स्वागत करेगा, में उसके घर के समास्त दोषों को दूर कर दूँगा एवं सभी विघ्नों को समाप्त कर दूँगा।
तभी से यह महोत्सव धूम धाम से मनाया जाता है।
२।: एक कथा यह भी है की जब कार्तिक भगवान महादेव से रुष्ट होकर दक्षिण भारत में अपना साम्राज्य बनाया एवं वहीं के राजा के रूप में उन्होंने वास करना शुरू किया। ऐस अमान जाता है की महादेव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर को हराया एवं समास्त देवतों को उस राक्षस से मुक्ति दिलवायी। तारकासुर ने स्वर्ग को जीत कर वहाँ वास कर लिए था एवं देवताओं को परेशान कर रहा था। कार्तिकेय भगवान के पास सभी देव गणों ने प्रार्थना की एवं क्रोध में आकर महादेव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था। ऐसा कहा जाता था की जो स्वर्ग को मुक्त करवाएगा वहाँ का सिंहासन उसी का होगा। इस प्रथा के अनुसार कार्तिकेय को स्वर्ग का सिंहासन मिलना चाहिए था लेकिन महादेव ने उन्हें केवल देवताओं का सेनापति बनाया एवं सिंहासन इंद्र को वापस दे दिया। यह देख कार्तिकेय बहुत दुखी हुए एवं रूठ कर दक्षिण भारत में चले गए।
माता पार्वती पुत्र वियोग में दुखी रहती थीं एवं उनकी ऐसी दशा देख कर गणपति ने अपने भाई कार्तिकेय के कुशल मंगल पूछने के लिए दक्षिण भारत की तरफ़ रुख़ किया। दक्षिण भारत पर जब गणपति जा रहे थे तो समुद्र तट के किनारे उनकी भगवान कार्तिकेय से मुलाक़ात हुई।दोनो भई एक दूसरे से मिलकर अत्यंत प्रसन्न हुए एवं कार्तिकेय ने उनका ज़ोरदार स्वागत किया और गणपति को बोला की अब वह कहीं नहीं जाएँगे एवं उनके पास ही रहेंगे। कार्तिकेय के आग्रह पर गणपति बोले कि वह तो बस उनकी कुशल मंगल पूछने आए थे एवं उन्हें शीघ्र ही माता पार्वती के पास वापस जाना है और उन्हें आपका समाचार देना है।
यह सुनकर कार्तिके उदास हो गए और फिर उन्होंने गणेश जी को रोकने के लिए बहाना बनाया की देखो मेरी तबियत ठीक नहीं है और कुछ दिन अगर तुम रहोगे एवं मेरा राजपाट देख लोगे तो मेरी सेहत ठीक हो जाएगी और आप उसके पश्चात चले जाना। गणपति मान जाते हैं , यह सुनकर सारी प्रजा भी उनका खूब आवभगत करती है क्योंकि वह उनके भगवान कार्तिकेय के भाई हैं।महाराष्ट्र प्रांत से लेकर पूरे दक्षिण भारत में गणपति का खूब स्वागत होता है एवं आवभगत होती है।
गणपति भी इस आतिथ्य से बहुत खुश होते हैं एवं जब अनंत चतुर्दशी के दिन वह जाने लगते हैं तो वहाँ की समस्त परेशानियों को एवं समस्त विघ्नों को अपने साथ हर कर ले जाते हैं। क्योंकि उनका मिलान समुद्र किनारे हुआ था तो उन्हें वही से विदा किया जाता है ताकि वह कैलाश आराम से प्रस्थान कर पाएँ। सभी प्रजागण उन्हें दोबारा जल्दी वापस आने का अनुग्रह करती हैं एवं उनसे कहती है की वह गणपति का इन दिनो अपने घर में इंतज़ार करेंगी एवं इसीलिए दक्षिण भारत में गणपति को अतिथि स्वरूप में पूजा जाता है।
उत्तर भारत में दस दिनो का गणेश उत्सव मनाने का प्रचलन नहीं है क्योंकि उत्तर भारत तो उनका निवास स्थान है फिर वह वहाँ अतिथि कैसे हुए। गणपति देव को तो सम्पूर्ण उत्तर भारत का दिकपाल कहा जाता है, वह उत्तर भारत की रक्षा करते हैं एवं वहाँ वास करते हैं। चाहे हिमालय में कैलाश हो या गंगा तट हो गणपति का तो यह घर है, फिर आतिथ्य कैसा ?
आज कल एक दूसरे की नक़ल कर एवं रील और सोशल मीडीया के चक्कर में उत्तर भारत में गणपति को उनके अपने ही घर में अतिथि बना कर, उन्हें उनके ही घर से विदा कर रहे हैं, यह कौन सी परम्परा है ? यह कौन सा विधान है?
फिर केवल दो महीनों के पश्चात, दीपावाली के महापर्व में उत्तर भारत में गणपति को माता लक्ष्मी जी के साथ घर में बैठाया जाता है , अगर आप उन्हें विदा कर देंगे एवं अगले बरस आने के लिए बोलेंगे तो वह तो दीपावली में आपके घर कैसे आएँगे।
किसी भी पूजा पाठ में स्थान, काल आदि का विशेष महत्व होता है और उसे उसी तरह मानना चाहिए जैसे कि परम्परा में रहा है।
आज कल सोशल मीडिया और रील देख कर एवं रील बनाने की होड़ में सभी इस उत्सव को देखा देखी मनाने लगे हैं एवं ऐसा कर अपनी ही हानि कर रहे हैं।
उत्तर भारत में भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश जी के प्रकाट्य उत्सव को धूम धाम से मनाया जाता है पर उन्हें अगर आप अपने घर में स्थापित कर रहे हैं तो वह हमेशा के लिए वह स्थापित होंगे। गणपति को चतुर्दशी के दिन विभिन्न भोग लगाए जाते हैं एवं माता पार्वती एवं महादेव के साथ उनका धूम धाम से पूजन किया जाता है। उन्हें हल्दी, सुपारी, सिंदूर, दूर्वा घास, मोदक, गुल्हड़ के फूल आदि विशेषकर अर्पित किए जाते हैं । उनपर हल्दी छिड़की जाती है, ऐसा माना जाता है की माता पार्वती ने अपने हल्दी के उबटन से ही गणपति का प्रकाट्य किया था।
गणेश चतुर्थी एवं गणेश उत्सव को अपने स्थान विशेष का ध्यान कर धूम धाम से मनाएँ एवं गणपति देव से अपने जीवन की ख़ुशियों के लिए आशीर्वाद माँगें, विघ्नहरता हैं, अवश्य आपकी मनोकामना पूर्ण करेंगे।
ज्योतिषाचार्या नंदिता पांडेय
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