१५ मई २०१८ को है ज्येष्ठ अमावस्या ,शनी जयंती एवं वट सावित्री व्रत ….. क्या होता है अमावस्या का महत्व ….कैसे करें पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए पूजा,,,, १५ मई को है शनी जयंती ,,,,, शनी जयंती मे करें ये उपाय, होगी मनोकामना पूर्ण,,,,, वट सावित्री व्रत से होगी अखंड सुहाग की प्राप्ति ,,,,,

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ज्येष्ठ अमावस्या :१५ मई २०१८ 

 
वैसे तो हर मास की अमावस्या को दान पुण्य एवं पितरों की शांति आदी कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है पर ज्येष्ठ अमावस्या का इन सभी अमावस्याओं मेन विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन को शनी जयंती के रूप मेन भी मनाया जाता है एवं इसी दिन वट सावित्री व्रत भी स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा के लिए करती हैं।

इस वर्ष ज्येष्ठ मास मेन अधिक मास भी शामिल हाई इस वजह से इस वर्ष ज्येष्ठ मास मेन दो अमावस्या, दो पूर्णमासी रहेगी एवं चार एकादशियाँ रहेंगी।  
अमावस्या का महत्व :
 
अमावस्या के दिन दान पुण्य का विशेष महत्व है , इस दिन प्रातः काल उठ कर पवित्र नदियों मे स्नान कीया जाता है एवं पितरों के लिए तर्पण करने का भी विधान है। अगर नदी में स्नान नहीं कर सकते हैं तो आपको इस दिन प्रातः काल एक बाल्टी जल मे थोड़ा सा गंगा जल दाल कर उससे स्नान करना चाहिए। एक कलश मे जल डाल कर उसमें म काले तिल डाल कर , दक्षिण मुखी होकर अपने पितरों को तर्पण दे। इस दिन पिण्ड दान का भी विशेष विधान है। 
 
स्नान के पश्चात पितरों के नाम से आप तर्पण आदी तो करे ही साथ ही में उनके नाम से दान भी अवश्य करें। आपके इस कृत्य से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है साथ ही में आपके लिए भी सौभाग्य वर्धक स्तिथियाँ बनती जाती हैं। 
 
संध्या के समय, एक मुट्ठी चावल लेकर उस पर अपने आँगन मे दक्षिण मुखी दिया जलाएँ। ऐसा करने से आपके पितरों को असीम सुख एवं शान्ति की प्राप्ति होती है। 
 
आज के दिन संध्या के समय, ध्यान/ मेडीटेशन अवश्य करना चाहिए एवं अपने पितरों की तरफ़ ईश्वर की ऊर्जा प्रवाहित करनी चाहिए। आपके द्वारा किया गया ऐसा कृत्य उनके लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करेगा। 
शनी जयंती : 
ज्येष्ठ मास अमावस्या के दिन शनी जयंती भी मनायी जाती है। इस समय शनी देव वक्रि हैं। शनी की तिरचि दृष्टि होती है एवं उनके प्रकोप से बड़े बड़े राजा भी रंक बन जाते हैं, वहीं उनकी कृपा से  रंक भी राजा बन जाते हैं। 
 
शनी जयंती मे क्या करें : 
 
अगर आप शनी की साड़ेसाती से गुज़र रहे हैं या फिर शनी की ढैय्या आपको परेशान कर रही है, कुंडली में शनी नीच के पड़ें हों या फिर शनी की वजह से किसी भी प्रकार की परेशानी हो रही हो तो आज के दिन वीशेषकर आपको शनी देव का पूजन करना चाहिए। 
 
प्रातः काल उठ कर स्नान आदी से शुद्ध होकर, शनी मंदिर मे जाएँ एवं शनी दान करें। शनी दान के लिए आपको सवा मीटर काला कपड़ा, उड़द की दाल, काले तिल, लौंग, लोहे की कोई वस्तु जैसे कील या चिमटा,तिल के लड्डू आदी दान मेन देने चाहिए। 
 
शनी की पीड़ा को शांत करने के लिए महिलाओं के आश्रम में दान अवश्य करना चाहिए । माता के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर दिन की शुरुआत करनी चाहिए। 
शनी चालीसा या फिर शनी का शांति मंत्र अवश्य पड़ें : 
” ॐ प्राँ प्रीं प्रूँ सः शनैश्चराये नमः ” 
इस मंत्र का १०८ बार पाठ अवश्य करें।  
 
आज के दिन हनुमान मंदिर मे जाकर हनुमान जी को चोला चड़ाना भी अत्यंत शुभ होता है। ऐसा करने से शनी से समबंधित पीड़ा का नाश होता है।
पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीया जलाएँ। आज के दिन काल सर्प दोष की शांति का भी विशेष विधान होता है। शिव मंदिर मे चाँदी के नाग नागिन का जोड़ा चड़ाना भी शुभ होता है। अगर यह सम्भव नहीं है तो सवा किलो सबूत जौं को नदी मे प्रवाहित करें। रांगे में बने हुए रहु केतु के यंत्र को भी नदी मेन प्रवाहित कर सकते हैं। रांगा ढाती जल मेन घुल जाता हाई एवं जल को शुद्ध भी करता है। ऐसा अगर सम्भव ना हो तो आपको यह शिव मंदिर मेन दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से राहु एवं केतु की शांति होती है। 
 
वट सावित्री व्रत : 
 
आज ही के दिन सुहागिने अपने सुहाग एवं संतान की रक्षा के लिए वट सावित्री व्रत का भी पालन करती हैं। निरण्यामृत पुराण के अनुसार वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को किया जाता है, वहीं पर स्कन्द पुराण के अनुसार, ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत किया जाता है।
वट सावित्री व्रत की महिमा : 
 
ऐसा कहा जाता है की इस व्रत को कर सावित्री ने अपने पती सत्यवान को यमराज की मृत्यु गाह से दोबारा जीवित किया गया था। वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री ने तपस्या की थी इसीलिए इस दिन इस वृक्ष की पूजा एवं परिक्रमा भी की जाती है।
 
वट सावित्री के व्रत की पूजन विधी : 
 
प्रातः काल स्नान आदी से शुद्ध होकर, वट वृक्ष के नीचे,  किसी शुद्ध स्थान पर गंगाजल छिड़क कर उसे शुद्ध करें।  बाँस की टोकरी मे सत अनाजा भरकर उस पर ब्रह्मा जी की प्रतिमा को स्थापित करें।  ब्रह्मा जी की प्रतिमा के बाईं तरफ़ सावित्री की प्रतिमा एवं दाईं तरफ़ सत्यवान की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। इसके पश्चात वट वृक्ष को जल का अर्घ्य दे एवं पूजा मे फल, फ़ूल, सूत, चने की दाल, मौलि, रोलि, अक्षत, धूप दीप आदी से षोडशोपचार द्वारा पूजन करना चाहिए। सावित्री एवं सत्यवान की कथा सुनने के पश्चात, अपने अखंड सुहाग की कामना करते हुए, सूत के धागे से महिलाएँ वट वृक्ष की तीन बार परिक्रमा करती हैं। 

इसके पश्चात, बाँस के पत्तल मे चने की दाल एवं फल, फ़ूल नैवैद्य आदी डाल कर दान करना चाहिए एवं व्रत का पारण करना चाहिए। 

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