वैसाख पूर्णिमा ३० अप्रैल २०१८ को पड़ रही है … भगवान बुद्ध की जयंती, निर्वाण की प्राप्ति सभी इस दिन हुई,,,,, आज क्या करें,,, की हो सुख शान्ति का आवाहन,,,,,,, ध्यान/ योग के लिए उत्तम दिन,,,

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बुद्ध पूर्णिमा या वेसाक़ पूर्णिमा 
30 अप्रैल २०१८  
 
बैसाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा या वेसाक़ पूर्णिमा की तरह मनाया जाता है।बैसाख मास की पूर्णिमा होने की वजह से इसे बैसाख पूर्णिमा भी कहा जाता है। सनातन धर्म में यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि माघ मास से शुरू होने वाले नदी में स्नान आदि करने की यह वर्ष की आख़िरी पूर्णिमा होती है। 
 
बैसाख पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध (सिद्धार्थ/गौतम बुद्ध) का जन्म तो हुआ ही था, साथ ही उन्होंने इसी दिन निर्वाण को प्राप्त भी किया था एवं इसी दिन अपने शरीर को त्याग भी था। इस वर्ष वैसाख पूर्णिमा दिनांक ३० अप्रैल २०१८ को पड़ रही है। 
 
बौध धर्म के लोग दिन भर इस दिन को हर्षोल्लास से मनाते हैं। ज़्यादातर बौध भिक्षु सफ़ेद वस्त्र धारण कर, विभिन्न पताकाओं से अपने निवासों को सुसज्जित कर, ध्यान आदि में संलग्न रहते हैं। साथ ही साथ विभिन्न समारोह एवं कार्यक्रमों के द्वारा भी इस दिन को मनाया जाता है। 
भगवान बुद्ध को निर्वाण की प्राप्ति बोधि वृक्ष ( पीपल) के नीचे बैठ कर हुई थी, इसीलिए इस दिन विशेषकर इस वृक्ष को सुसज्जित कर इसके चारों तरफ दीये आदि जला कर पूजन किया जाता है।

पीपल के पेड़ का महत्व : 

 
ऋग  वेद में भी वर्णिनत है पीपल के पेड़ की महिमा के बारे में जहाँ लिखा हुआ है की पूजनीय सरस्वती नदी का उद्गम भी पीपल के पेड़ से हुआ था। यह स्कन्द पुराण में भी लिखा हुआ है की ब्रह्मा के कमंडल से समस्त ऊर्जा पीपासिका ( पीपल) के पेड़ पर गिरी एवं वहाँ से सरस्वती नदी का संचार हुआ। वामन पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है की सरस्वती नदी का उद्ग़म पीपल के पेड़ से ही हुआ है। 
 
भगवान कृष्ण ने भी पीपल के पेड़ की श्रेष्ठता एवं  महिमा के बारे में बताते हुए यह कहा की मैं पूर्ण जगत में व्याप्त हूँ, समस्त सन्तों में मैं नारद हूँ, ऋषियों में मैं कपिल ऋषि हूँ, गंधर्वों में मैं चित्रार्थ हूँ वैसे ही समस्त वनस्पति में मैं पीपल हूँ। 
 
पीपल के पेड़ में वैसे भी ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का वास रहता है एवं इसीलिए इसकी सनातन धर्म में बहुत अधिक मान्यता है। पीपल का पेड़ जैन धर्म एवं बौध धर्म में भी पूजनीय है। 
पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास माना जाता है। भगवान कृष्ण विष्णु अवतार थे एवं भगवान बुद्ध भी भगवान विष्णु के नौवें अवतार माने जाते हैं। उन्हें भी निर्वाण की प्राप्ति पीपल के वृक्ष के नीचे ही हुई थी। 
 
बौध धर्म में पीपल के पेड़ की मान्यता : 
 
पीपल के पेड़ को पूरे संसार में सबसे पुराना फूल देने वाला वृक्ष माना जाता है। माना जाता है की जब भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ तो पूरे पीपल के वृक्ष में फूल स्फुटित हुए एवं उनके ऊपर एवं ज़मीन में चारों तरफ़ झरने लगे। यह श्रीलंका के “अनुराधापुरा” स्थान में स्तिथ है जहाँ पर उस वृक्ष की शाखा ले जायी गयी थी जिसके नीचे भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था। इसे “जयश्री महाबोधि” वृक्ष कहा जाता है एवं इसे वहाँ २८८ इसा पूर्व में लगाया गया था। 
पीपल का वृक्ष या बौध धर्म में प्रेम से पुकारा जाने वाला बोधि वृक्ष की आज के दिन विशेष पूजा की जाती है। 

भक्त जन इस दिन पीपल के वृक्ष को खीर चड़ते हैं, उसके चारों तरफ़ घी के दीये  प्रज्वल्लित किए जाते हैं।  
 
भगवान बुद्ध के निर्वाण से सम्बंधित पौराणिक कथा : 
 
भगवान बुद्ध का उल्लेख संभी प्रमुख पुराणों में एवं हिंदू ग्रंथों में मिलता है। उन्हें विष्णु अवतार भी माना जाता है। 
 
कहा जाता है की जब भगवान बुद्ध को निर्वाण की प्रति होने वाली थी तो कई राक्षसिय शक्तियों ने उनका मार्ग रोकने की कोशिश की एवं उनका ध्यान भंग करने के लिए भी प्रयासरत रहे। ऐसी की एक किवदंति के अनुसार, मारा नामक दैत्य ने भगवान बुद्ध की तपस्या को भंग करना चाहा। ऐसा करने के लिए उसने अपनी तीनो पुत्रियों को यह कार्य सौंपा। उसकी तीनो पुत्रियों ने छल से, काम से, मोह से, हर प्रकार की माया से भगवान बुद्ध की तपस्या भंग करनी चाही लेकिन सफल नहीं हुई। ऐसा देख मारा दैत्य और भी क्रोधित हुआ एवं पाताल से उसने अपनी समस्त सेना को बुलाया एवं भगवान बुद्ध की तपस्या भंग करने को कहा। दैत्यों की सेना ने त्रहिमाम चारों तरफ़ मचा दिया लेकिन बुद्ध की तपस्या भंग नहीं कर पाए। 
 
जब दैत्यों ने अति मचा दी तो भगवान बुद्ध ने अपनी एक ऊँगली धरती पर रखी एवं वसुधा माँ का आवाहन करते हुए प्रार्थना की,” हे माँ, आप इस सब उपद्रव की साक्षी हैं, अब आप ही मेरी रक्षा कीजिए ” । उनके ऐसा कहते ही धरती माँ क्रोध से कम्पन करने लगीं एवं चारों तरफ़ एक आँधी तूफ़ान की स्तिथी बन गयी, यह आँधी तूफ़ान, एवं धरती का भूकम्प की तरह कम्पन, भगवान बुद्ध के स्थान को छोड़ कर समस्त जग को हिलाने डुलाने लगा। दैत्यों की सेना माँ के इस रौद्र रूप को स्वीकार नहीं कर पायीं एवं माँ ने उन्हें अपने अंदर निगल लिया। जैसे ही ऐसा हुआ, धरती माँ की ऊपरी सतह शांत हो गयी एवं भगवान बुद्ध की तपस्या के सभी विघ्न समाप्त हो गए। रात भर ध्यान करने के पश्चात भोर की पहली किरण के साथ उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई। निर्वाण की प्राप्ति के साथ साथ उन्हें अपने समस्त पिछले जन्मों की छवियाँ एक के बाद एक कर अपने समक्ष चित्रंकित होते दिखीं।
 
अपने इतने सारे पिछले जन्मों को देख कर उन्हें इस बात का अहसास हुआ की दुःख, उदासी, जन्म मृत्यु, सभी क्षणिक हैं एवं जो है वह है प्रेम के साथ जीवन यापन करना, सभी के लिए अत्यंत करुणा रखना। अपने निर्वाण प्राप्ति के पश्चात उन्होंने सबसे पहले अपने पाँच साथियों को निर्वाण का ज्ञान दर्शाया। वहाँ से जो उनकी एक यात्रा शुरू हुई, वह इतने वर्षों पश्चात आज भी व्याप्त है। उनकी जीवन यात्रा में जिन जिन बौध भिक्षुओं ने जितना  जितना ज्ञान प्राप्त किया, उन्होंने आगे बड़ कर उतने ही ज्ञान की शिक्षा आगे बड़ायी। 
 
भगवान बुद्ध की शिक्षा :
भगवान बुद्ध ने कभी भी अपनी पूजा करने को नहीं कहा, ना ही उन्होंने बोला की मेरी मूर्ति बना कर पूजन किया जाए। उनका तो यह मानना था कि हम सब में निर्वाण प्राप्त करने की ऊर्जा है। किसी में जागृत है एवं किन्ही में सुप्त है लेकिन जिनमे सुप्त है , उन्मे भी निर्वाण को प्राप्त करने की क्षमता है। 
 
वह समाज में एक क्रांतिकारी थे, उनसे पहले समाज में यह मान्यता थी की स्त्रियाँ निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकती, पर उन्होंने इस बात को नकारते हुए कहा की स्त्रियों में जागृत होने की क्षमता किसी भी पुरुष से ज़्यादा होती है एवं वह भी निर्वाण प्राप्त कर सकती है। यह उस समय की विपरीत परिस्थितियों के समक्ष एक बहुत बड़ा क़दम था। 
 
सनातन धर्म एवं बौध धर्म में सम्बंध : 
 
बौध धर्म की उत्पत्ति सनातन धर्म से ही हुई है, लेकिन वह वेदों का अनुसरण नहीं करते  एवं इसीलिए इसे हिन्दू धर्म की नास्तिक मत/ शाखा के रूप में आज भी स्वीकार्य किया जाता है। हालाँकि, सनातन धर्म की कुछ कृतियों के विपरीत बौध धर्म जातिवाद को बिलकुल नहीं मानता एवं सभी व्यक्तिजन को एक समान सम्मान देता है। 
 
आज के दिन विशेषकर क्या करें :
बैसाख पूर्णिमा एक बहुत ही सुंदर दिन है जिस दिन पूरे दिन भर बहुत सकरात्मक ऊर्जा का संचार पूरे संसार में होता है। इस दिन पवित्र नदियों में प्रातः काल स्नान करने की मान्यता है। अगर आप नदी में स्नान नहीं कर सकते हैं तो थोड़ा सा गंगाजल एक बालटी पानी में डाल कर स्नान अवश्य करें, शुद्धि होती है। साथ की आज अपने पितरों का स्मरण कर उनके नाम से दान आदि करने से भी उन्हें तो मुक्ति मिलती ही है साथ ही आपके बहुत सारे अवरोधों से आपको मुक्ति मिलती है। 
 
आज का दिन सकरात्मक बदलाव लाने का दिन है एवं थोड़ा सा ध्यान ( मेडिटेशन) करना आपके लिए एवं आपके परिवार के लिए सुख एवं शांति लेकर अवश्य आएगा।
आज के दिन किया गया कोई भी नया कार्य सफल होता है एवं समय में पूर्ण भी होता है।  
~ नन्दिता पाण्डेय 
ऐस्ट्रोटैरोलोजेर , आध्यात्मिक गुरु 
www.nanditapandey.biz
soch.345@gmail.com , +91-9312711293 
 
 

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